Sunday, February 12, 2017

Book Review : The One Minute Manager

Title: The One Minute Manager
Author: Ken Blanchard and Spencer Johnson
Pages: 110
By: Rajesh Meena Bujeta

In today’s hectic life, we often run from pillar to post to get things done. This may include the work at home, in office or at other work place. According to the author, the key to come out of such messy situation is to take out a minute in planning things carefully and then chasing them for results. The term ‘one minute’ is more symbolic in nature, but it indicates that we should take some time out to ponder on the work we do and people we manage, so that better outcome can be achieved. The author has described through a story, his theoretical concepts with ample practical examples to relate to.  According to him, there are three most important activities, through which you can convert your workplace a much better unit. One can invest more or less in each one of the activities as per the quality and efficiency of the staff. The three activities and their ingredients are as follows:-

One Minute Goal Setting: Each worker should know clearly what is expected from him. There are no surprises as everyone knows about their role. This is what it says:-
  1. Agree on your goals.
  2. See what good behaviour looks like.
  3. Write out each of your goals on a single page using less than 250 words.
  4. Read and re-read each goal, which takes only a minute or so each time.
  5. Take a minute every once in a while out of your day to look at your performance, and
  6. See whether or not your behavior matches your goal.

One Minute Praisings: ‘Help people reach their full potential…Catch them doing something right!’ is the main purpose of this activity. The summary may be as follows:-
  1. Tell people right from the start that you are going to let them know how they are doing.
  2. Praise them immediately.
  3. Tell people what exactly they did right – be specific.
  4. Tell people how good you feel about what they did right, and how it helps the organization and the other people who work there.
  5. Stop for a moment of silence to let them feel how good you feel.
  6. Encourage them to do more of the same.
  7. Shake hands or touch people in a way that makes it clear that you support their success in the organization.

One Minute Reprimand: It will work well when you do the following:-
  1. Tell people beforehand that you are going to let them know how they are doing an in no uncertain terms.
  2. Reprimand people immediately.
  3. Tell people what they did wrong – be specific.
  4. Tell people how you feel about what they did wrong – and in no uncertain terms.
  5. Stop for a few seconds of uncomfortable silence to let them feel how you feel.
  6. Shake hands, or touch them in a way that lets them know you are honestly on their side.
  7. Remind them how much you value them.
  8. Reaffirm that you think well of them but not of their performance in this situation.
  9. Realize that when the reprimand is over, it’s over.
But while doing it, you should reprimand the behaviour of a staff, not the person himself.

Hence it becomes very clear that the author tries to focus on the manpower. It is the human resource that makes or breaks an organisation. Hence proper attention should be given to the staff as and when needed. I would simply put the words of author which are self-explanatory:-

‘The best minute I spend, is the one I invest in people’
Everyone is a potential winner. Some people are disguised as losers; don’t let their appearances fool you’
‘Take a minute; Look at your goals, look at your performance. See if your behaviour matches your goals.’
‘We are not just our behaviour; We are the person managing our behaviour’
‘Goals begin behaviour; consequences maintains one’

The above concepts and philosophy is very vividly described through a simple story, which makes this book much better to digest. Finally, it may not be applicable to all situations or organisations, but it will at least give you some idea about managing yourself and your subordinates. So I would suggest that you go for it. It’s a small book of around100 pages and will not take more than 2 hours to finish. That’s a good deal.

Monday, January 30, 2017

मेरी परछाई

मेरी परछाई और मैं,
एक ही तो हैं।
पूरक एक दूसरे के।
वो समाई है कहीं,
मेरे ही भीतर।
पर फिर भी,
कभी लडती है,
कभी झगडती है,
रूठने-मनाने की रस्म निभाती है,
मेरी परछाई ।

दुपहर की तपती धूप में,
कभी पास आती,
तो कभी दूर जाती है,
इसी तरह दिन भर, 
लुका- छिपी का खेल खेलती।
कभी स्थिर, शांत, कभी चंचल,
तो कभी अदृश्य ।
अनेकों रूप धरती है,
मेरी परछाई ।
परंतु रात की खामोशी में,
सन्नाटे की परत के बीच,
ओस की बूंदो से हो तर, 
अंधेरे में डरी सहमी सी,
लिपट जाती है मुझसे।
खूब कस के।
और रात भर,  
सीने से चिपककर, 
चैन से सोती है,
मेरे साथ।
मेरी परछाई ।।

-----------  राजेश मीणा बुजेटा 

Tuesday, January 3, 2017

मेरे अंश

मेरे अंश,
कैसे हो तुम?
क्या तुम मेरे स्पर्श को,
महसूस करते हो?
क्या मेरे हृदय की,
बढ़ी हुई धड़कन को,
तुम भी सुन सकते हो?
क्या तुम्हे पता है,
खुशी के मारे,
रोम रोम सिहर गया था मेरा,
तुम्हारे आने की खबर पाकर।
कांपते हाथों से, 
ऑखे मूंद,
तुम्हे गले लगाया था।
पहली बार।

                                                          मेरे भीतर तुम्हे,
                                                                घुटन सी लगती होगी ना?
तुम्हारी चंचलता के आगे,
यह दुनिया सिमट जाती होगी।
हाथ - पैर चलाते हो,
बेचैन हो, बाहर आने को?
या कुछ कहना चाहते हो?
पर निश्चिंत रहना, सुकून से, 
महफूज हो तुम
मेरी रूह के आगोश मे,
मेरे गर्भ में।

चैन से सोओ, खेलो, कूदो।
और मुझे भी तुम्हे,
महसूस करने दो।
या मन करे तो 
बात कर लिया करो मुझसे,
  हाॅ, मै सुन सकती हूं तुम्हे।
   शब्द - शब्द, हर पल।

बेसब्र है ऑखे,
तुम्हे देखने को। 
और आतुर है मन,
तुम्हारे नाजुक और कोमल,
गालो के चुंबन को।
इस खूबसूरत दुनिया में,
तुम्हारी पहली मुस्कुराहट का,
पहली चहक का,
पहले कदम का,
पहले शब्द का,
मेरे अंश, स्वागत है।।

----- राजेश मीणा बुजेटा

शायरी - २

डूपहर तक बिक गया!
बाज़ार का हर एक झूट ! और
मैं एक सच ले कर शाम तक
बैठा हे रहा…
खूकर पाने का मज़ा हे कुछ और है
रोकर मुस्कुराने का मज़ा हे कुछ और है
हार तो ज़िंदगी का हिस्सा है मेरे दोस्त
हारने के बाद जीतने का मज़ा हे कुछ और है
तालीम नही दी जाती
परिंदो को उड़ने की.
वो तो खुद ही समझ
जाते हैं उचाई आसमानो की.
मंजिले तो मिलती हैं,
भटक कर ही सही
पर गुमराह तो वा हैं,
जो घर से निकलते ही नही

वो मायूसी के लम्हों में ज़रा भी हौसला देता !तो हम कागज़ की कश्ती पर समुन्दर में उतर जाते !!
तू काम करता गया,
मैं इश्क़ करता गया ...
तेरा नाम होता गया,
मैं बदनाम होता गया

चौड़वी का चाँद हो
या आफताब हो ...
जो भी हो तुम खुदा की
कसम लाजवाब हो
आज उतनी भी नहीं महखाने में ,
जितनी हम छोढ़ दिया करते थे पैमाने में…

आग सूरज में होती है ,
जालना धरती को पडता है.
मोहब्बात आंखेन करती हैं ,
तडपणा दिल को पडता है

दिल के छालों को कोई शायरी कहे,
तो दर्द नही होता
तकलीफ़ तो तब होती है,
जब लोग वा-वा करते हैं
​तेरी हर बात ​मोहब्बत में गवारा करके​;
​दिल के बाज़ार में बैठे है खसारा करके​;
​मुन्तजिर हूँ के सितारों की जरा आँख लगे​;
​चाँद को छत पर बुला लूँगा इशारा करके​;
​आसमानों की तरफ फैंक दिया है मैने​;
​चंद मिटटी के चरागों को सितारा करके​;
​मैं वो दरिया हूँ कि हर बूंद भंवर है जिसकी​;​​
​तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके।

​तेरी हर बात ​मोहब्बत में गवारा करके​;
​दिल के बाज़ार में बैठे है खसारा करके​;
​मुन्तजिर हूँ के सितारों की जरा आँख लगे​;
​चाँद को छत पर बुला लूँगा इशारा करके​;
​आसमानों की तरफ फैंक दिया है मैने​;
​चंद मिटटी के चरागों को सितारा करके​;
​मैं वो दरिया हूँ कि हर बूंद भंवर है जिसकी​;​​
​तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके।
काश भगवान मुझसे छोड देते किताब बना कर…
वो रात भर हम पढ़ते…
और फिर सो जाते सीने से लगा कर.
दुनिया में धोखा आम बात है।
अब सूरज को ही देख लो
आता है किरण के साथ

रहता है रोशनी के साथ
और जाता है संध्या के साथ।
रोती हुई आँखो मे इंतेज़ार होता है,
ना चाहते हुए भी प्यार होता है,
क्यू देखते है हम वो सपने,
जिनके टूटने पर भी उनके सच होने
का इंतेज़ार होता है?…..
जीत की खातिर बस जुनून चाहिए,
जिसमे उबाल हो ऐसा खून चाहिए,
यह आसमान भी आएगा ज़मीन पर,
बस इरादों मे जीत की गूँज चाहिए.

"अगर ख़ुदा नहीं हैं,
तो उसका ज़िक्र क्यों..
और अगर ख़ुदा है,
तो फिर फिक्र क्यों".
जाती है किसी झील की गहराई कहाँ तक,
आँखोंमें तेरी डूब के देखेंगे किसी दिन…
कहते है जीते हैं उमीद पे लोग
हम को जीने की भी उमीद नही..
हर फूल को रात की रानी नही कहते,हर किसी से दिल की कहानी नही कहते,मेरी आँखों की नमी से समझ लेना,हर बात को हम जुबानी नही कहते.

शेर खुद अपनी ताकत
से राजा केहलाता है;
जंगल मे चुनाव नही होते.. ।।
में बंदूक और गिटार
दोनों चलाना जानता हूं ।
तय तुम्हे करना हे की
आप कौन सी धुन पर नाचोगे..।।
हथियार तो सिर्फ सोंख के लिए रखा करते हे ,
खौफ के लिए तो बस नाम ही काफी हे ।
जिंदगीमें बडी शिद्दत से निभाओ
अपना किरदार,
कि परदा गिरने के बाद भी तालीयाँ
बजती रहे….।।
जी भर गया है तो बता दो
हमें इनकार पसंद है इंतजार नहीं…!
मुझको पढ़ पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं,
मै वो किताब हूँ जिसमे शब्दों की जगह जज्बात लिखे है….!!
खुद ही दे जाओगे तो बेहतर है..!
वरना हम दिल चुरा भी लेते हैं..!
इतना भी गुमान न कर आपनी जीत पर ऐ बेखबर,
शहर में तेरे जीत से ज्यादा चर्चे तो मेरी हार के हैं..!!
बहुत गुस्ताख है तेरी यादे इन्हे तमीज सिखा दो कमबख्त दस्तक भी नही देती और द्ल में उतर जाती है
बड़ी गुस्ताखियाँ करने लगा है
मेरा दिल अब मुझसे
ये कम्बखत जब से तेरा हुआ है
मेरी सुनता ही नहीं।
एक हद के बाद, दर्द भी दवा बन जाता है,
एक हद के बाद, झूठ भी सच बन जाता है,
यही है असलियत जिंदगी की,
एक हद के बाद, दुश्मन भी दोस्त बन जाता है !!

मौत को तो मैंने कभी देखा नहीं,
पर वो यकीनन बहुत खूबसूरत होगी,
कमबख्त जो भी उससे मिलता है,
जिंदगी जीना ही छोड़ देता है !!
जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है,
थोड़ा रुलाती है थोड़ा हसाती है,
खुद से ज्यादा किसी पे भरोसा मत करना,
क्योंकि अँधेरे में तो परछाईं भी साथ छोड़ जाती है !!
जिंदगी की असली उड़ान अभी बाकी है,
जिंदगी के कई इम्तिहान अभी बाकी हैं,
अभी तो नापी है मुटठी भर ज़मीन आपने,
आगे अभी सारा आसमान बाकी है !! 

शायरी - १

फिर इश्क़ का जुनूं चढ़ रहा है सिर पे ,
मयख़ाने से कह दो दरवाज़ा खुला रखे !

यूँ तो सिखाने को ज़िन्दगी
बहुत कुछ सिखाती है...!!
झूठी हंसी हँसने का हुनर तो
बस मोहब्बत ही सिखाती है...!!

आए बारिश ज़रा थम के बरस,
जब मेरा यार आ जाए तो जूम के बरस,
पहले ना बरस को वो आ ना सके,
फिर इतना बरस की वो जा ना सके…..
सुनो साहब ....!!
ये जो इश्क है ना ...?
जान ले लेता है
मगर फिर भी मौत नहीं आती .............!!
वो नकाब लगा कर खुद को
इश्क से महफूज़ समझते रहे;
नादां इतना भी नहीं समझते कि इश्क
चेहरे से नहीं आँखों से शुरू होता है!
वो मेरे दिल पर सिर रखकर सोई थी बेखबर;
हमने धड़कन ही रोक ली कि
कहीं उसकी नींद ना टूट जाए।
इस शहर के बादल तेरी जुल्फ़ों की तरह हैये आग लगाते है बुझाने नहीं आते।क्या सोचकर आए हो मुहब्बत की गली मेंजब नाज़ हसीनों के उठाने नहीं आते।अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैआते है मगर दिल को दुखाने नहीं आते।
गुज़रे है आज इश्‍क के उस मुकाम से, नफरत सी हो गयी है मोहब्बत के नाम से ।
​दुःख देकर सवाल...
दुःख देकर सवाल करते हो;
तुम भी जानम! कमाल करते हो;
देख कर पूछ लिया हाल मेरा;
चलो कुछ तो ख्याल करते हो;
शहर-ए दिल में ये उदासियाँ कैसी;
ये भी मुझसे सवाल करते हो;
मरना चाहें तो मर नहीं सकते;
तुम भी जीना मुहाल करते हो;
अब किस-किस की मिसाल दूँ तुम को;
हर सितम बे-मिसाल करते हो।
~ Mirza Ghalib

क्या खबर थी हमे के..
"मोहब्बत" हो जाए गी...
हमे  तो बस...
तेरा "मुस्कुराना" अछा लगा था..

हम भूल जाते हैं उस के सारे सितम,
जब उस की थोरी सी मुहब्बत याद आती है...!!
जब  टूटने  लगे  हौसले  तो  बस  ये  याद  रखना,
बिना  मेहनत  के  हासिल  तख्तो  ताज  नहीं  होते,
ढूँढ़ ही लेते है अंधेरों  में  मंजिल  अपनी,
जुगनू  कभी  रौशनी  के  मोहताज़  नहीं  होते…..!!!!!!!!!!!
सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो
किसीके वासते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
यहाँ किसीको कोई रासता नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो
यही है ज़िंदगी, कुछ ख़ाक चंद उम्मीदें
इन्ही खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
ग़लतफ़हमियों के सिलसिले इस कदर फैले हैं…
कि हर ईंट सोचती है, दीवार हमहीं से है…

जब चलना नहीं आता तो गिरने नहीं देते थे लोग….
जब से संभाला खुद को कदम कदम पर गिराने की सोचते है लोग….
संघषोॅ मे यदि कटता है तो कट जाए सारा जीवन,
कदम कदम पर समजौता करना मेरे बस की बात नही..!
हम आज भी अपने हुनर मे दम रखते है,
होश उड़ जाते है लोगो के, जब हम महफील में कदम रखते है।।
जिंदगी की असली उड़ान अभी बाकी है
जिंदगी के कई इंतेहाँ अभी बाकी है
अभी तो नापी है मुट्ठी भर ज़मीन हमने
अभी तो सारा आसमान बाकी है…
पल पल तरसे थे उस पल के लिए,
मगर यह पल आया भी तो कुछ पल के लिए ,
सोचा था उसे ज़िंदगी का एक हसीन पल बना लेंगे ,
पर वो पल रुका भी तो बस एक पल के लिए.
सो गए बच्चे गरीब के ये सुनकर …।
ख्वाब में फरिस्ते आते है रोटिया लेकर ……!!

Saturday, March 5, 2016

मातृत्व का एहसास

आज जब वो देखती है,
अपनी नन्ही परी को,
एकटक, अपलक,
ममता भरी नजरों से।
दो बूँद स्नेह की,
प्यार का मोती बन,
लुढ़क जाती हैं,
उसके गालो पर।

उस रोज,
ठीक एक साल पहले,
दर्द की दीवार को लांघ,
कराह की वेदना को भस्म कर,
उसने स्वयं अपने अंग से,
एक नई,
संस्कृति को जन्म दिया था।
और आज भी,
वो खूबसूरत लम्हा याद कर,
महसूस होता है उसे,
कि वक्त, थम सा गया है । 

शरारत भरी,
परी की मुस्कुराहट,
छोटी छोटी,
और नाजुक सी उंगलियो से,
उसके गाल को पकड़ने की कोशिश,
और कोमल पैरो से,
डगमगाते हुए चलते देख,
खुशी से चहक जाती है वो।
और सैलाब मातृत्व का,
भर देता है, भीतर तक,
उसका रोम रोम।

परी को देखती है,
सोते हुए सुकून से जब,
तो उसे एहसास होता है,
कि आज वह ,
पूर्ण है, शान्त है ,
अतीत और भविष्य से परे,
बस वर्तमान मे।।

     --- राजेश मीणा ' बुजेटा '


दो खूबसूरत,
पर समय के तराजू मे उलझे,
विचारों का टकराव,
एक अतीत का प्रतिबिंब,
तो दूजा,
भविष्य की कल्पना।
निश्चित है,
वर्तमान रूपी,
खूबसूरत लम्हे का,
दो पाटों के बीच पिसना।।

ना ये उसके,
अरमान, ख्वाब,
या आकांक्षाओं को समझता।
और ना ही वो इसके,
तर्क, कारण,
या तड़प को स्वीकारता।।

एक बेहद लम्बे,
पर अर्धनिर्मित पुल के,
दो छोर हैं ये विचार।
जो पूरक हैं,
एक - दूजे के।
पर ग्रसित हो,
द्वेष से,
समयाभाव के कारण,
अधीर, बेसब्र हो,
कोसते है,
एक दूसरे को।

वर्तमान में,
वो बीच में जो,
बन रहा है खम्भ,
अभी बेबस और लाचार है,
पर एहसास है उसे,
कि कल,
उसी के कंधों पर टिकेगा,
भार उन दो छोर का।
और वो बनेगा,
गवाह, साक्षी,
उन दो विपरीत,
विचारों के मिलन का।
अतीत व भविष्य के बीच की,
खाई को पाटकर,
एक सुनहरे वर्तमान का।

       --- राजेश मीणा ' बुजेटा '

तेरा साथ

एक सुकून सा है,
बेहद मीठा सा,
और तृप्ति का एहसास,
कोमल सा,
ये साथ तेरा।

निश्चिंत हूं मै,
अतीत के अंधेरों से,
भविष्य में आने वाली,
विपत से।
जो आज  अब है,
संग मेरे,
साथ तेरा,
हर डर, शिकन को,
दूर रखता, मीलों।

ये एहसास,
देता है मुझे,
एक शांत मन,
और अब,
निश्चिंत हूं मै,
गमों से।
तेरे प्यार का कवच,
और मुस्कुराहट का,
काला टीका,
घेरे है मुझे।
परत दर परत।
                   ----- राजेश मीणा ' बुजेटा '